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टिंडे की खेती कैसे करे?


टिंडे को round melon, round gourd, Indian squash भी कहा जाता है| यह उत्तरी भारत की सबसे महत्तवपूर्ण गर्मियों की सब्जी है। टिंडे का मूल स्थान भारत है। यह कुकरबिटेसी प्रजाति से संबंधित है। इसके कच्चे फल सब्जी बनाने के लिए प्रयोग किए जाते हैं। 100 ग्राम अन-पके फलों में 1.4% प्रोटीन, वसा 0.4%, कार्बोहाइड्रेट 3.4%, कैरोटीन 13 मि.ग्रा. और 18 मि.ग्रा. विटामिन होते हैं। इसके फल की औषधीय विशेषताएं भी हैं, सूखी खांसी और रक्त संचार सुधारने के लिए इसका उपयोग किया जाता है।

टिंडे की खेती कैसे करे?

जलवायु

इसकी फसल के लिये गर्मतर जलवायु अच्छी होती है । अधिक गर्म व ठन्डी जलवायु उपयुक्त नहीं होती है । बीज के अंकुरण के लिये फरवरी-मार्च का मौसम अच्छा होता है
अच्छी पैदावार के लिए 10℃ से 28℃ का तापक्रम उचित रहता है।

भूमि का चयन

बढ़िया विकास और पैदावार के लिए अच्छे निकास वाली, उच्च जैविक तत्वों वाली रेतली दोमट मिट्टी की आवश्यकता होती है। बढ़िया विकास के लिए मिट्टी का pH 6 से 7 होनी चाहिए। पानी के ऊंचे स्तर वाली मिट्टी में यह बढ़िया पैदावार देती है|

खेत की तैयारी

मिट्टी के भुरभुरा होने तक ज़मीन की जोताई करें। गाय का गला हुआ गोबर 8-10 टन प्रतिकिलो खेत की तैयारी के समय प्रति एकड़ में डालें। खेती के लिए बैड तैयार करें। बीजों को गड्ढों या खालियों में बोया जा सकता है।

खाद प्रबन्ध

खादें(किलोग्राम प्रति एकड़)

UREA

SSP

MURIATE OF POTASH

90

125

35


तत्व(किलोग्राम प्रति एकड़)

NITROGEN

PHOSPHORUS

POTASH

40

20

20


टिंडे की पूरी फसल को नाइट्रोजन 40 किलो (यूरिया 90 किलो), फासफोरस 20 किलो (सिंगल सुपर फासफेट 125 किलो), और पोटाश 20 किलो (म्यूरेट ऑफ पोटाश 35 किलो) प्रति एकड़ में डालें। नाइट्रोजन की 1/3 मात्रा, फासफोरस और पोटाश की पूरी मात्रा बिजाई के समय डालें। बाकी बची नाइट्रोजन की मात्रा शुरूआती विकास के समय में डालें।

बीज की तैयारी

बीज की मात्रा
एक एकड़ बिजाई के लिए,1.5 किलो बीजों की मात्रा काफी होती है।
बीजों का उपचार
बिजाई से पहले 12-24 घंटे के लिए बीजों को पानी में भिगो दें। इससे उनकी अंकुरन प्रतिशतता में विकास होता है। बीजों को मिट्टी से होने वाली फंगस से बचाने के लिए, कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम या थीरम 2.5 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें। रासायनिक उपचार के बाद, बीजों को ट्राइकोडरमा विराइड 4 ग्राम या स्यूडोमोनास फलूरोसैंस 10 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें।

पौधों को लगाना

बिजाई का समय
उत्तर भारत में, इसकी खेती दो बार की जा सकती है। इसे फरवरी-मार्च और जून-जुलाई में भी बोया जा सकता है।
फासला
बीजों को बैड के दोनों तरफ बोयें और 45 सैं.मी. फासले का प्रयोग करें।
बीज की गहराई
बीजों को 2-3 सैं.मी. की गहराई में बोयें।
बिजाई का ढंग
बीजों को सीधे या मेंड़ पर बोया जा सकता है।

पौधों की सिंचाईं

इसे लगातार सिंचाई की जरूरत होती है क्योंकि यह कम समय की फसल है। बीजों को सिंचाई से पहले खालियों में बोया जाये, तो पहली सिंचाई बिजाई के बाद दूसरे या तीसरे दिन करें। गर्मियों के मौसम में, 4-5 दिन के फासले पर जलवायु, मिट्टी की किस्म, के अनुसार सिंचाई करें। बारिश के मौसम में बारिश की आवृति के आधार पर सिंचाई करें। टिंडे की फसल को ड्रिप सिंचाई देने पर अच्छा परिणाम मिलता है और 28% पैदावार बढ़ाता है।

किट/रोग और उनसे बचाव

हानिकारक कीट और रोकथाम
तेला और चेपा:
यह पत्तों का रस चूसते हैं, जिससे पत्ते पीले पड़ जाते हैं और मुरझा जाते हैं। तेले के कारण पत्ते मुड़ जाते हैं, जिससे पत्तों का आकार मुड़ कर कप की तरह हो जाता है|
अगर खेत में इसका हमला दिखाई दें तो, थाइमैथोक्सम 5 ग्राम को 15 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
बीमारियां और रोकथाम
पत्तों पर सफेद धब्बे:
इस रोग से पत्तों के ऊपरी सतह पर सफेद रंग के पाउडर के धब्बे पड़ जाते हैं, इससे पौधे का तना भी प्रभावित होता है। ये पत्तों को खाद्य स्त्रोत के रूप में प्रयोग करते हैं। इसके हमले के कारण पत्ते और फल पकने से पहले ही गिर जाते है|
इसका हमला दिखाई दें तो, पानी में घुलनशील सलफर 20 ग्राम को 10 लीटर पानी में मिलाकर 10 दिनों के अंतराल पर 2-3 बार स्प्रे करें।
एंथ्राक्नोस:
एंथ्राक्नोस से प्रभावित पत्ते झुलसे हुए दिखाई देते हैं। इसकी रोकथाम के लिए, कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें। अगर इसका हमला खेत में दिखाई दें तो, मैनकोजेब 2 ग्राम या कार्बेनडाज़िम 0.5 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

फलों की तुड़ाई

किस्म के आधार पर बिजाई के 60 दिनों में फल तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं। जब फल पक जाएं और मध्यम आकार के हो जायें तब तुड़ाई कर लें। 4-5 दिनों के फासले पर तुड़ाई करें।

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